शीर्षक पढ़कर आप भी
चौंक गए होंगे लेकिन यह बात सच है एक समय ऐसा भी आया था जब इस दुनिया के लगभग सभी सांपो
का विनाश हो गया था सिवाय सांपों के राजा तक्षक के | उस समय आस्तिक मुनि की बुद्धिमता
के चलते सांपों का विनाश रुक गया अन्यथा सांपों का अंत तो हो ही जाता साथ में यह दुनिया
भी अंधकार में डूब जाती | इस बात के पीछे छुपे रहस्य के बारे में ही हम आज आपको बताएँगे
|
जब पाँचों पाण्डवों
ने पृथ्वी पर शासन करके अपना समय पूरा कर लिया तब एक वक्त वह भी आया जब वे सभी शरीर
को छोड़कर स्वर्ग को प्रस्थान करने लगे | जाते-जाते उन्होंने अपना संपूर्ण राज्य अर्जुनपुत्र
अभिमन्यु और उत्तरा के बेटे परीक्षित को सौंप दिया | राजा परीक्षित सफलतापूर्वक राज्य
का संचालन कर रहे थे |
एक बार राजा परीक्षित
शिकार खेलने वन को गए हुए थे | शिकार करते-करते वे महर्षि शमिक की कुटिया के निकट पहुँचे
| जब वे शमिक ऋषि के पास पहुँचे तब उन्होंने देखा कि महर्षि तपस्या में लीन हैं और
उनके आने का कोई स्वागत नहीं कर रहे हैं | यह देखकर राजा परीक्षित अत्यंत क्रोधित हो
गए और एक मरा हुआ सांप उठाकर साधना में लीन शमिक ऋषि के गले के ऊपर लटका दिया | इस
वजह से महर्षि का ध्यान भंग हो गया और क्रोधित ऋषि ने उन्हें श्राप दे दिया कि आज से
ठीक सातवें दिन नागाओं का राजा तक्षक तुझे आकर काट लेगा |
राजा परीक्षित खिन्न
मन से महल पहुँचे और अपनी सुरक्षा के बारे में सोचने लगे | उन्होंने अपनी सुरक्षा का
अच्छे से बंदोबस्त कर लिया और अब राजा से जुडी हर वस्तु का बारीकी से परीक्षण होता
था लेकिन होनी को कौन टाल सकता है | एक दिन एक ऋषि राजा परीक्षित से मिलने उनके महल
में पहुँचे | उस ऋषि ने राजा परीक्षित को उपहार स्वरुप एक पुष्पों का गुलदस्ता दिया
| नागराज तक्षक उसी गुलदस्ते में एक कीड़े का रूप धारण करके बैठे थे और जैसे ही राजा
परीक्षित ने वह गुलदस्ता अपने हाथ में लिया उसी समय नागराज तक्षक अपने असली नागरूप
में आ गए और राजा को डंस लिया | राजा परीक्षित की वहीं तत्काल मृत्यु हो गयी |
राजा परीक्षित की मृत्यु
के पश्चात राजगद्दी पर उनका पुत्र अर्थात अर्जुन का पड़पोता जनमेजय गद्दी पर बैठा |
जब उसे यह ज्ञात हुआ कि उसके पिता की मृत्यु का कारण एक सर्प है तब उसने यह निर्णय
लिया कि वह पूरी सृष्टि से सांपों का अंत कर देगा | इसी कारण हेतु उसने सर्पमेध यज्ञ
करने का निर्णय लिया |
जब सर्पमेध यज्ञ आरम्भ
हुआ तब लाखों-करोड़ों की संख्या में सर्प आते हुए सीधे यज्ञ के उस हवन कुण्ड में जाकर
भस्म होते जा रहे थे और एक समय ऐसा भी आया जब उसके पिता को डंसने वाले स्वयं नागराज
तक्षक की बारी आ गयी वह यज्ञ की अग्नि की ओर खिंचा चला आ रहा था लेकिन रास्ते में ही
उसने सूर्य देवता के रथ से अपने फन को लपेट लिया | इस कारण से सूर्यदेव भी उस अग्नि
में खींचे चले जा रहे थे |
सूर्यदेव का अग्नि
में जाने का मतलब था अंधकार की शुरुआत और सृष्टि का अंत | यह देखते हुए कई व्यक्तियों
और ऋषि-मुनियों ने जनमेजय को समझाया कि वह इस यज्ञ को रोक दे अन्यथा पूरी पृथ्वी अंधकार
में डूब जाएगी परन्तु जनमेजय ने मना कर दिया क्योंकि वह अपने पिता की हत्या का बदला
नागराज तक्षक से लेना चाहता था | अंत में महर्षि आस्तिक प्रकट हुए जो कि स्वयं एक ब्राम्हण
पिता और एक नागमाता के पुत्र थे | उन्होंने जनमेजय को अच्छे से समझाया और अंततः जनमेजय
ने सर्पमेध यज्ञ को बीच में ही छोड़ दिया और सांपों की प्रजाति को एक बड़े ही विनाश से
बचा लिया |
