जानिए कैसे हुई तुलसी और शालिग्राम की शादी - a2zfact | all facts

जानिए कैसे हुई तुलसी और शालिग्राम की शादी

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वैसे तो हमारा भारतीय समाज कई प्रकार के त्यौहारों को मनाता है लेकिन कुछ त्यौहार उनमें से बहुत खास होते हैं | इन्हीं त्यौहारों में से एक है 'देवउठनी एकादशी' | इस दिन को छोटी दीपावली के नाम से भी जाना जाता है | इसके अलावा इस दिन को किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है क्योंकि इस दिन जिस कार्य की भी आप शुरुआत करेंगे वह अवश्य ही सफल होगा |

ऐसा माना जाता है कि प्रलय के बाद जब प्रभु श्रीहरि निद्रा से जागते हैं और जब उनके मन में सृष्टि के आरम्भ की इच्छा उठती है वह शुभ दिन देवउठनी ही होता है | इसके अतिरिक्त इस दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह भी कराया जाता है जिससे आपके कार्य में किसी भी प्रकार की कोई बाधा ना आये लेकिन क्या आपको पता है कि इनका विवाह कराये जाने के पीछे का रहस्य क्या है ? यदि, नहीं तो आज हम आपको इसी रहस्य से अवगत कराएँगे | (क्यों तुलसी का प्रयोग वर्जित है गणेश जी की पूजा में)

बहुत समय पहले दम्भ नाम का राक्षस हुआ करता था | वह भगवान श्रीहरि का अनन्य भक्त था परन्तु उसकी ज़िन्दगी में सिर्फ एक ही बात की कमी थी | उसकी कोई भी संतान नहीं थी | उसने बहुत पूजा-अर्चना की परन्तु उसे कोई भी लाभ प्राप्त नहीं हुआ | अंततः उसने राक्षसों के कुलगुरु महर्षि शुक्राचार्य के पास जाकर अपनी समस्या कही | उसकी समस्या सुनकर गुरु शुक्राचार्य ने उसे कृष्ण मन्त्र प्रदान करते हुए पुष्कर नामक स्थान पर जाकर विष्णु भगवान की तपस्या करने की सलाह दी |

वहाँ जाकर उसने घनघोर तप किया और उसके तप से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उसे एक प्रतापी पुत्र के होने का वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गए | कुछ समय बाद राजा दम्भ को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई और उन्होंने उसका नाम शंखचूर्ण रखा | ऐसा कहा जाता है कि पूर्वजन्म में शंखचूर्ण भगवान विष्णु के मुख्य पार्षदों में से एक था जिसे किसी कारणवश श्रीकृष्ण की प्रियतमा राधा जी ने राक्षस जाति में पैदा होने का श्राप दे दिया था |

शंखचूर्ण बड़ा होने के बाद ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके वरदान प्राप्त करने के उद्देश्य से वन में जाकर तपस्या करने लगा | उसकी तपस्या से प्रभावित होकर ब्रह्मा जी ने उससे वरदान माँगने को कहा और उसने यह वरदान माँगा कि कोई भी देवता, राक्षस, किन्नर या मनुष्य इत्यादि मेरा वध ना कर पाएं | तब ब्रह्मा जी ने उससे कहा कि तुम यहाँ से सीधा बदरीवन जाओ | वहाँ पर धर्मध्वज जी की बेटी तुलसी तप कर रही है | यदि तुम उससे विवाह कर लो तो तुम्हे कोई भी देवता, मनुष्य इत्यादि नहीं मार पायेगा |

यह सुनकर वह सीधे बदरीवन पहुँचा | वहाँ जब उसने तुलसी के रूप एवं यौवन को देखा तब वह मंत्रमुग्ध होकर रह गया | तभी ब्रह्मा जी वहाँ उपस्थित हुए और उन्होंने उन दोनों को गन्धर्व पद्धति से शादी करने को कहा | दोनों ने ब्रह्मा जी का आदेश मानते हुए विवाह कर लिया |

शंखचूर्ण को यह वरदान प्राप्त हो गया था कि उसे कोई देव-दानव इत्यादि नहीं मार पाएंगे | इसलिए वह सभी को हराता हुआ इन्द्रलोक पहुँचा और देवताओं को पराजित करके उनसे स्वर्गलोक छीन लिया | एक राक्षश कुल का होने के बावजूद वह अन्य राक्षसों से बहुत अलग था | वह अपनी प्रजा की बहुत अच्छे से देखभाल रखता था | इसके साथ ही वह हमेशा ही कृष्णभक्ति में लीन रहता था |

स्वर्ग छिन जाने के कारन परेशान देवता सीधे ब्रह्मा जी के पास पहुँचे और उनसे शंखचूर्ण की मृत्यु का रहस्य पूँछा | तब ब्रह्मा जी ने उन सभी देवों को विष्णु जी के पास इस समस्या का इलाज़ जानने के लिए भेजा | विष्णु जी ने बताया कि शंखचूर्ण की मौत केवल शिव जी के त्रिशूल से ही हो सकती है | यह सुनकर सभी देवता शिव जी के पास पहुँचे और अपनी व्यथा सुनाई |

देवताओं की समस्या को सुनने के बाद शिव जी ने अपने एक दूत चित्ररथ को शंखचूर्ण के पास देवताओं के स्वर्गलोक को छोड़ने के सन्देश के साथ भेजा जिसे शंखचूर्ण ने यह कहकर ठुकरा दिया कि जब तक मैं भगवान शिव के साथ युद्ध में पराजित नहीं हो जाता तब तक मैं यह स्वर्गलोक नहीं छोड़ूँगा |

यह उत्तर सुनने के पश्चात शिव जी देवताओं समेत शंखचूर्ण से युद्ध करने के लिए निकल पड़े | भयंकर संग्राम छिड़ गया लेकिन शंखचूर्ण ब्रह्मा जी के वरदान और अपनी पत्नी तुलसी के सतीत्व के कारण देवताओं पर भारी पड़ रहा था | आखिर में युद्ध को समाप्त करने के उद्देश्य से जब शिव जी ने अपना त्रिशूल शंखचूर्ण को मारने के लिए उठाया | तभी एक आकाशवाणी हुई कि जब तक शंखचूर्ण की पत्नी तुलसी अखंडित पतिव्रत धर्म का पालन कर रही है और जब तक इसके शरीर में श्रीहरि का दिव्य सुरक्षा कवच मौजूद है तब तक महादेव आप इसको मृत्यु प्रदान नहीं कर सकते |

यह आकशवाणी जानकर विष्णु जी ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप लिया और शंखचूर्ण के पास जाकर उसका श्रीहरि का दिव्य कवच माँगा और शंखचूर्ण ने भी बिना किसी हिचकिचाहट के वह कवच उन्हें दे दिया | इसके बाद भगवान विष्णु शंखचूर्ण का रूप धारण कर तुलसी के पास पहुँचे और शिव जी एवं अन्य देवताओं के ऊपर अपनी जीत का बखान किया | यह सुनकर तुलसी ने विष्णु जी को अपना पति मानकर उनका आदर-सत्कार किया |

उधर तुलसी की पवित्रता खंडित होने पर शिव जी ने शंखचूर्ण के ऊपर अपना त्रिशूल चलाया और उसे मृत्यु प्रदान कर दी | उसी समय जब यह तुलसी को यह ज्ञात हुआ कि उसके साथ भगवान विष्णु ने छल करके उसके पति को मृत्यु दिलवाने में देवताओं की सहायता की है | उसने क्रोधित स्वर में कहा कि आपने एक स्त्री की पवित्रता को नष्ट करते हुए उसके पति को मृत्यु दिलवाने में सहायता की है | यह कृत्य केवल एक पत्थर दिल अर्थात पाषाण ह्रदय ही कर सकता है | इसलिए आज से आप पत्थर रूप में परिवर्तित हो जायेंगे |

तब श्रीहरि ने तुलसी का गुस्सा ठंडा करते हुए उससे कहा कि तुमने मेरी अभूतपूर्व तपस्या की है इसलिए अब तुम यह शरीर छोड़कर मेरे साथ बैकुंठ धाम चलोगी और तुम्हारा शरीर 'गण्डकी' नामक नदी में परिवर्तित हो जायेगा और तुम सभी पौधों में सर्वश्रष्ठ तुलसी का रूप धारण करोगी | इसके अतिरिक्त मैं तुम्हारे वचन को सिद्ध करने के उद्देश्य से उसी गण्डकी नदी के किनारे एक पत्थर के रूप में उपस्थित रहूँगा और उस नदी में मौजूद कीड़े-मकोड़े उस पत्थर को काटकर उसमे एक चक्र का निर्माण करेंगे जिसे लोग शालिग्राम के नाम से जानेंगे | भविष्य में हर कार्य को आरम्भ करने से पहले उसकी कार्य की सफलता कामना हेतु लोग तुलसी और शालिग्राम का विवाह अवश्य करेंगे |