वैसे तो महाभारत के
युद्ध के बारे में हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं | आप यह भी जानते होंगे कि कौरवों
के पक्ष में एक से बढ़कर एक योद्धा थे | उनके प्रथम सेनापति भीष्म से लेकर उनके दूसरे
सेनापति द्रोणाचार्य तक लगभग सभी अजेय थे लेकिन इन दोनों को ही पाण्डवों ने श्रीकृष्ण
की माया के सहारे आसानी से हरा दिया था | इन दोनों के बाद यदि कोई कौरवों के दल में
सबसे अधिक शक्तिशाली था तो वह था महादानी कर्ण | कहते हैं वह अर्जुन से भी सर्वश्रेष्ठ
धनुर्धर था लेकिन फिर भी अर्जुन ने उसे आसानी से मृत्यु प्रदान कर दी थी | क्या आप
जानते हैं कि इसके पीछे श्रीकृष्ण और देवराज इंद्र की माया थी ?
ऐसा कहा जाता है कि
देवी कुंती ने पाण्डु के साथ विवाह करने से पहले स्वयं को प्राप्त वरदान की सहायता
से सूर्यदेव का ध्यान करते हुए एक पुत्र की कामना की थी और उन्हें कर्ण पुत्रस्वरूप
मिला | जब कर्ण पैदा हुआ तब कुंती अविवाहित थी और समाज में अपनी इज्जत को खोने के डर
से उसने कर्ण को नदी में एक टोकरी सहित बहा दिया था | कर्ण जब पैदा हुआ था तब जन्म
से ही उसे दिव्य कवच और कुण्डल प्राप्त थे जो उसकी किसी भी शस्त्र से रक्षा करने में
सक्षम थे |
जब कर्ण ने युद्ध में
सेनापति का पद संभाला तब देवराज इंद्र और कृष्ण जी चिंतित हो उठे क्योंकि वे जानते
थे कि जब तक कर्ण के शरीर में वह कवच और कुण्डल मौजूद है तब तक उसकी मृत्यु संभव नहीं
है | देवराज इंद्र इस बात से सबसे ज्यादा चिंतित थे क्योंकि वे अर्जुन के धर्मपिता
थे | तब कृष्ण जी ने एक उपाय निकला उन्होंने देवराज इंद्र से ब्राम्हण का रूप धारण
करके कर्ण से उसका कवच और कुण्डल दान में माँगने को कहा |
कर्ण का यह प्रतिदिन
का नियम था कि शाम की सूर्यपूजा करने के पश्चात कोई भी व्यक्ति यदि उससे कुछ मांगता
था तब वह उस व्यक्ति को मना नहीं करता था | एक दिन शाम के समय ही उसकी पूजा समाप्त
होने के पश्चात जब ब्राम्हण रूप धारण किये हुए इंद्र वहाँ पहुँचे तब उन्होंने कहा कि
मैं आपसे आपकी एक प्रिय वास्तु माँगना चाहता हूँ परन्तु मुझे यह डर है कि कहीं आप मुझे
वह देने से मना ना कर दें इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप सबसे पहले मुझे वह वस्तु देने
का संकल्प करें |
यह सुनकर कर्ण ने कहा
कि यदि आपको मेरे प्राणों की इच्छा है तो वह भी मैं अभी तत्काल आपके सम्मुख उपस्थित
कर सकता हूँ इसलिए मैं आपको वचन देता हूँ कि आप जिस भी वस्तु की कामना करेंगे वह वस्तु
मैं आपको अवश्य दूँगा चाहे इसमें मेरे प्राण ही क्यों ना चले जाये | यह सुनकर इंद्र
ने कहा कि मुझे आपके प्राण नहीं अपितु आपके कवच और कुण्डल चाहिए |
यह सुनकर एक पल के
लिए तो कर्ण स्तब्ध रह गया लेकिन अगले ही पल उसने अपनी कटार निकली और अपने शरीर के
साथ जन्म से ही जुड़े हुए उन महत्वपूर्ण वस्तुओं कवच और कुण्डल को काटकर ब्राम्हणरुपी
इंद्र को उपहार स्वरूप दे दिया | उसकी इस दानवीरता से इंद्र भी एक क्षण के लिए चकित
रह गया लेकिन अगले ही क्षण तत्परता से वह अपने रथ से इंद्रलोक जाने के लिए अग्रसर हुआ
|
कुछ दूर जाने पर उसका
रथ ज़मीन में धँस गया और एक आकाशवाणी हुई कि तुमने अपने पुत्र अर्जुन के लिए जो कर्ण
के साथ छल किया है यह उसी का फल है | यदि तुम्हे इस मुसीबत से छुटकारा चाहिए तो तुम्हे
कर्ण को भी वरदान स्वरुप उस कवच और कुंडल के बराबर का कोई अस्त्र देना होगा |
यह सुनकर इंद्र अपने
असली रूप में कर्ण के पास पहुँचे और उससे वरदान माँगने के लिए कहा परन्तु कर्ण का कहना
था कि वह सिर्फ दान करता है कभी किसी से कुछ माँगता नहीं | यह सुनकर इंद्र फिर से उसे
कुछ माँगने के लिए कहने लगे परन्तु कर्ण बार-बार मना ही करता रहा |
अंत में जब इंद्र को
लगा कि कर्ण अपने मन से कुछ नहीं माँगेगा तब वह तत्परता से अपना वज्र वहाँ छोड़ कर चला
गया और जाते-जाते कह गया कि इसका इस्तेमाल तुम किसी देवता पर भी कर सकते हो और जिस
पर भी तुम यह चलाओगे वह जीवित नहीं बचेगा लेकिन तुम्हें इसका सिर्फ एक बार ही उपयोग
करने का मौका मिलेगा | मजबूरन कर्ण को वह वज्र रखना पड़ा | बाद में वह इस शक्ति को अर्जुन
पर इस्तेमाल करना चाहता था लेकिन परिस्थितवश उसे इसका इस्तेमाल घटोत्कच पर करना पड़ा
और अंत में अर्जुन ने कवच और कुण्डल रहित कर्ण को युद्ध में मार गिराया था |
