जब छिड़ गया भगवान शिव और श्रीराम के बीच युद्ध - a2zfact | all facts

जब छिड़ गया भगवान शिव और श्रीराम के बीच युद्ध


हम सभी रामायण की कथा अच्छी तरह से जानते हैं और यह भी जानते हैं कि रावण को हराकर जब श्रीराम अयोध्या लौटे थे तब उन्होंने समस्त पृथ्वी पर रघुकुल की पताका फहराने के लिए अश्वमेध नाम का परम प्रतापी यज्ञ किया था | इस यज्ञ की प्रथा के अनुसार जो राजा अश्वमेध यज्ञ करता है उसकी विजय के प्रतीक एक घोड़े को हर राज्य में जाने की इजाजत रहती है और वह घोड़ा जिस राज्य पर विश्राम करेगा उस राज्य के राजा को अश्वमेध यज्ञ कर रहे राजा के शासन को मानना पड़ेगा या उससे युद्ध करना होगा |

रामायण के उत्तरकाण्ड में उल्लेख है कि एक बार श्रीराम के स्वयं के पुत्रों लव और कुश ने अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को एक बार पकड़ा था एवं जब भीषण युद्ध छिड़ गया तब स्वयं महर्षि वाल्मीकि के द्वारा श्रीराम और उनके पुत्रों के बीच समझौता कराया गया था परन्तु क्या आपको पता है इसके अतिरिक्त एक बार और भी श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ा गया था ?

जी, हाँ एक बार जब श्रीराम के राज्य का अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा देवपुर राज्य की सीमा पर पहुँचा | देवपुर में राजा वीरमणि का शासन चलता था जिनके रुक्मांगद और शुभंगद नाम के दो प्रतापी पुत्र और वीरसिंह जैसा एक महारथी भ्राता भी था | राजा वीरमणि श्रीराम के अच्छे मित्र और भगवान शिव के परमभक्त थे एवं अपनी तपस्या से शिव जी को प्रसन्न करके उन्होंने यह वर प्राप्त किया था कि महादेव उस राज्य में आने वाली किसी भी मुसीबत से उनके राज्य की रक्षा करेंगे |

जब अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा देवपुर में पहुँचा तब रुक्मांगद ने उसे पकड़ लिया और उसके पास मौजूद श्रीराम के सैनिकों से कहा कि वे युद्ध करके अपना घोड़ा छुड़ा सकते हैं | वे सैनिक अपने शिविर में यह सूचना देने चले गए | उधर जब राजा वीरमणि को यह बात पता चली तब उन्होंने कहा कि श्रीराम हमरे परममित्र हैं इसलिए हमें उनका घोड़ा उन्हें लौटा देना चाहिए परन्तु उनके पुत्र ने क्षत्रियधर्म की दुहाई देते हुए कहा कि एक क्षत्रिय बिना लड़े कोई भी वस्तु नहीं लौटा सकता इसलिए अब तो हमें युद्ध करना ही होगा तब राजा वीरमणि ने मजबूरन युद्ध के लिए अपनी सेना तैयार करने का आदेश दिया |

उधर श्रीराम के शिविर में शत्रुघ्न, हनुमान, सुग्रीव और भरतपुत्र पुष्कल जो उस समय घोड़े की सुरक्षा के लिए वहाँ मौजूद थे उन्होंने युद्ध करने का संकल्प लिया परन्तु हनुमान जी कहना था कि यह नगरी स्वयं महाकाल द्वारा आशीर्वाद प्राप्त है इसलिए हमें एक बार प्रभु श्रीराम से अवश्य सलाह कर लेनी चाहिए | उनकी बात सुनकर शत्रुघ्न ने कहा कि हम बिना घोड़े के श्रीराम के पास नहीं जा सकते इसलिए हमें यह युद्ध अवश्य ही लड़ना पड़ेगा |

अब दोनों ही पक्षों में युद्ध छिड़ गया | शत्रुघ्न राजा वीरमणि के दोनों पुत्रों से तो महाबली हनुमान राजा वीरमणि के भाई वीरसिंह से एवं भरतपुत्र पुष्कल स्वयं राजा वीरमणि से युद्ध करने लगा परन्तु अयोध्या के वीरों के सामने राजा वीरमणि की का कोई जोर नहीं चला | अंत में उन्होंने अपने आराध्या महादेव की स्तुति की | उनकी प्रार्थना को सुनकर महाकाल ने अपने सभी गणों और अपने प्रतिरूप वीरभद्र को युद्धभूमि में जाकर राजा वीरमणि की सहायता करने के लिए बोला |

शिव जी के गणों के पहुँचते ही अयोध्या के सभी दलों में हाहाकार मच गया | शत्रुघ्न ने शिव के गण भृंगी पर आक्रमण किया लेकिन शत्रुघ्न को असफलता ही हाथ लगी | उधर पुष्कल के इस्तेमाल किये हुए सभी चमत्कारिक अस्त्र वीरभद्र पर बेकार जा रहे थे | इसलिए अंत में पुष्कल ने वीरभद्र पर दिव्यशक्ति से हमला किया जिससे घायल वीरभद्र ने एक ही झटके में पुष्कल का सिर धड़ से अलग कर दिया |

इधर हनुमान जी और नंदी का भयानक संग्राम छिड़ा हुआ था | दोनों ही भगवान शिव के अंश से उत्पन्न हुए थे इसलिए दोनों ही हार मानने को तैयार नहीं थे लेकिन अंत में नंदी के अचानक शिवास्त्र के हमले से हनुमान जी भी घायल हो गए | उस समय सभी अयोध्या के सैनिक और योद्धा श्रीराम को याद करने लगे | अपने सैनिकों की व्यथा सुनकर स्वयं श्रीराम युद्धभूमि में पहुँचे |

वहाँ पहुँचते ही जब उन्होंने अपने सैनिकों का यह हाल देखा और अपने भाई भरत के पुत्र पुष्कल को मृत पाया तो अत्यंत क्रोधित होकर सभी गणों को एक क्रूर युद्ध के लिए तैयार हो जाने को कहा | शुरुआत में उन्होंने अपने साधारण बाणों का इस्तेमाल किया परन्तु जब उनका शिव के गणों पर कोई असर नहीं हुआ तब उन्होंने अपने गुरु विश्वामित्र द्वारा दिए गए अस्त्रों का स्मरण करके उनका संधान किया |

इससे सारे शिवगणों में कोलाहल मच गया और सब अपने प्रभु भगवान शिव को स्मरण करने लगे | तब युद्ध भूमि में स्वयं महादेव पहुँचे | यह देखकर श्रीराम में अपने अस्त्रों का त्याग करते हुए कहा कि आपकी ही कृपा से मैंने रावण को मार और अब यह अश्वमेध यज्ञ कर रहा हूँ इसलिए कृपया आप युद्ध को विराम दें | यह सुनकर शिव जी ने कहा कि मैंने राजा वीरमणि को इस राज्य की सुरक्षा का वरदान दिया है इसलिए आप अपने शस्त्रों को त्याग दें | यह सुनकर श्रीराम युद्ध के लिए तत्पर हो गए |

दोनों महान आत्माओं के बीच यह युद्ध देखने के लिए समस्त देवी-देवता, गन्धर्व, किन्नर इत्यादि आकाश में इकठ्ठा हो गए | दोनों ही तरफ से चमत्कारिक और दिव्य अस्त्रों का प्रयोग प्रारम्भ हो गया | बहुत लम्बे समय तक युद्ध चलता रहा और अंत में श्रीराम ने शिव जी द्वारा ही प्राप्त पाशुपतास्त्र से उन पर हमला किया जो सीधे उनकी छाती में जाकर विलीन हो गया |

यह देखकर शिव जी अत्यंत प्रसन्न हो गए और उन्होंने युद्ध का अंत करते हुए श्रीराम से वरदान माँगने को कहा | तब श्रीराम में कहा कि युद्ध में असंख्य सैनिक, योद्धा एवं मेरे भ्राता भरत के पुत्र पुष्कल की निरर्थक मृत्यु हुई है इसलिए उन सभी को जीवित करने का कष्ट करें | यह सुनकर शिव जी ने उनकी यह इच्छा पूरी कर दी और अपने लोक को चले गए | अंत में वह घोड़ा राजा वीरमणि ने श्रीराम को लौटा दिया और अपने पुत्र रुक्मांगद को अपना राज्य सौंपकर उस घोड़े की रक्षा हेतु हनुमान आदि के साथ चल पड़े |