कैसे हुआ भगवान नरसिंह का क्रोध शांत - a2zfact | all facts

कैसे हुआ भगवान नरसिंह का क्रोध शांत


हम सभी भगवान विष्णु के सभी दशावतारों के बारे में जानते हैं | जब भगवान विष्णु ने वराह रूप का अवतार लेकर पृथ्वी का हरण करने वाले दैत्य हिरण्याक्ष का वध किया तब उसका भाई हिरण्यकश्यपु अत्यंत क्रोधित हो गया और उसने वरदान पाने की अभिलाषा से ब्रम्हा जी की तपस्या की और उसकी तपस्या से खुश होकर ब्रम्हा जी ने उसे यह वरदान दिया कि उसे कोई भी मनुष्य, देवता या जानवर इत्यादि नहीं मार पाएंगे | इसके अतिरिक्त उसे यह भी वरदान मिला कि किसी भी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से उसकी मृत्यु नहीं हो पाएगी और ना ही धरती, आकाश या पाताल में उसे कोई मार पायेगा |

इस वरदान के बल पर वह तीनों लोकों का स्वामी बन गया और सभी लोगों के ऊपर अत्याचार करना शुरू कर दिया परन्तु उसका स्वयं का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था जिसकी वजह से हिरण्यकश्यपु उससे अत्यंत क्रोधित हो गया और उस पर जुल्म करने लगा | यह देखकर भगवान विष्णु एक खम्भे से नरसिंह अवतार में निकले जो कि आधे मनुष्य और आधे जानवर थे | उन्होंने अपने नाखूनों की सहायता से अपने जांघ के ऊपर हिरण्यकश्यपु को रखकर उसे मौत के घाट उतार दिया |

परन्तु इतना हो जाने के बाद भी भगवान नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ और अपने सामने आने वाले हर व्यक्ति को वे क्रोध की दृष्टि से देख रहे थे | यहाँ तक कि उनका प्रिय प्रह्लाद भी उन्हें शांत नहीं कर पा रहा था | अंत में सभी देवता ब्रम्हा जी के पास उनकी मदद माँगने के लिए पहुँचे परन्तु ब्रम्हा जी ने कहा कि वे विष्णु भगवान के अवतार हैं इसलिए हमें उन्हीं के पास मदद के लिए जाना चाहिए |

सभी विष्णु जी के पास पहुँचे परन्तु विष्णु जी ने भी भगवान नरसिंह के क्रोध को शांत करने में असमर्थता जताई और कहा कि इस सृष्टि में केवल महादेव ही ऐसे हैं जो भगवान नरसिंह के क्रोध को शांत कर सकते हैं क्योंकि भगवान नरसिंह महादेव के परमभक्त हैं | यह जानकर सभी देवतागण, ब्रम्हाजी एवं स्वयं भगवान विष्णु भी महादेव की शरण में पहुँचे और भगवान नरसिंह के गुस्से को शांत करने की प्रार्थना की |

यह सुनकर स्वयं महाकाल जब भगवान नरसिंह के समक्ष उनका क्रोध शांत करने के लिए पहुँचे तब तक भगवान नरसिंह का क्रोध पूरी तरह से अनियंत्रित हो चुका था इसलिए वे भगवान शिव को भी ना पहचान सके और उन्हें मारने के लिए उनकी ओर दौड़े | यह देखकर भगवान शिव ने एक विशाल शरभ का रूप धारण किया | यह शरभ रूप शेर ओर पक्षी के रूप का मिश्रण था एवं इस शरभ के आठ हाथ थे |

भगवान शरभ ने अपनी पूँछ की सहायता से भगवान नरसिंह को लपेट लिया ओर अपने साथ पाताल लोक की सीमा के अंदर ले गए | बहुत देर तक अपनी सारी ताकत लगाने के बावजूद भी जब भगवान नरसिंह शरभ की पूछ से नहीं छूट पाये तब उन्होंने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया और भगवान शंकर के उस शरभ रूप को पहचान कर उन्हें प्रणाम किया | इसके बाद जब सभी देवों ने भगवान शरभ से प्रार्थना की कि वे भगवान नरसिंह को छोड़ दें तब भगवान शरभ ने उन्हें अपनी पूँछ की पकड़ से आज़ाद कर दिया |