जब परशुराम ने कर दिया धरती को क्षत्रियविहीन - a2zfact | all facts

जब परशुराम ने कर दिया धरती को क्षत्रियविहीन

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अमरता का वरदान पाने वाले महर्षि परशुराम को कौन नहीं जानता | ऐसा कहा जाता है कि वे भगवान विष्णु के अंशावतार थे | कुछ धार्मिक ग्रंथो में उन्हें भगवान श्रीहरि का छठा अवतार भी माना गया है | वैसे तो भगवान परशुराम ब्राम्हण थे लेकिन जब वे अपना परशु अर्थात फरसा उठा लेते थे तब उनके शरीर का तेज़ किसी क्षत्रिय योद्धा से भी कई गुना अधिक रहता था | कुछ कथाओं में कहा गया है कि उन्होंने 21 बार इस धरती को क्षत्रियविहीन किया था लेकिन इस बात के पीछे की सच्चाई क्या है और उन्होंने ऐसा आखिर क्यों किया ?

आज हम आपको इसी बारे में बताएँगे | बहुत समय पहले महिष्मति शहर में हैहय वंश के राजाओं का शासन चलता था | राजा कार्तवीर्य बहुत ही अच्छे तरीके से राज्य का संचालन कर रहे थे | उनके और रानी कौशिक के मिलन से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने अर्जुन रखा | राजा कार्तवीर्य के पुत्र होने का कारण उसे कार्तेयवीर भी कहा जाता था | अर्जुन ने कड़ी तपस्या करके भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया और उसने भगवान से 10 हज़ार हाथों का वरदान माँगा | तभी से उसका नाम 'सहस्त्रार्जुन' पड़ गया |

वरदान पाने के बाद जब उसे महिष्मति का सिन्हासन प्राप्त हुआ तभी से उसने अपनी असलियत दिखानी शुरू कर दी | वह किसी भी वेद या धर्म को नहीं मानता था | प्रजा के ऊपर किसी भी तरह के अत्याचार को करने से वह पीछे नहीं हटता था | ब्राम्हणों के आश्रमों को नष्ट करना, किसी की भी बिना वजह हत्या कर देना और इस तरह के कई पापों को करने में उसे कोई लज़्ज़ा नहीं आती थी | कुछ समय बाद तो उसने अपने बल के प्रयोग से महिलाओं की पवित्रता को भी खंडित करना शुरू कर दिया | उसके इस तरह के अत्याचारों से सारी प्रजा दुखी हो चुकी थी |

एक बार शिकार करते-करते सहस्त्रार्जुन अपने राज्य से काफी आगे निकल चुका था | कई वनों को पार करने के बाद उसे एक आश्रम दिखाई दिया | इतना चलने के बाद वह और उसकी सेना काफी थक चुके थे | उसने सोचा क्यों ना कुछ देर इस आश्रम में सेना सहित विश्राम किया जाये | जब वह आश्रम के पास आया तब ऋषि जमदग्नि में उसे बताया कि यह उनका आश्रम है और उन्होंने सहस्त्रार्जुन का स्वागत किया | उसके बाद ऋषि जमदग्नि अपनी धर्मपत्नी रेणुका के साथ उन सभी का स्वागत करने में लग गए | सहस्त्रार्जुन ने सोचा कि यह ऋषि इतने सारे लोगों के खाने-पीने कि व्यवस्था कैसे करेंगे ?

यह वह सोच ही रहा था कि तभी महर्षि अपने साथ एक गाय को लाये | यह 'कामधेनु गाय' थी जो देवराज इंद्र ने महर्षि को उपहार स्वरुप प्रदान की थी | इस गाय की यह विशेषता थी कि वह किसी भी वस्तु को आपकी इच्छानुसार मात्रा में आपको तुरंत प्रदान कर सकती थी | उस गाय की सहायता से जमदग्नि ऋषि ने राजा और उसकी पूरी सेना का अच्छा आतिथ्य सत्कार किया लेकिन उस गाय की इस चमत्कारी कला को देखकर सहस्त्रार्जुन के मन में उस गाय को अपने साथ ले जाने की इच्छा उत्पन्न हुई |

यह सोचकर उसने महर्षि से उस गाय को माँगा लेकिन उन्होंने यह कहते हुए गाय देने में असमर्थता जताई कि यह गाय उनके आश्रम के प्रतिदिन की आवश्यकताओं के लिए बहुत जरुरी है | यह सुनकर सहस्त्रबाहु ने जबरदस्ती उस कामधेनु गाय को अपने साथ ले जाने का प्रयास किया | यह होता देख कामधेनु गाय वह से तुरंत अदृश्य होकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गयी | इससे क्रोधित सहस्त्रबाहु ने महर्षि के सम्पूर्ण आश्रम को नष्ट कर दिया |

जब जमदग्निपुत्र परशुराम वहाँ पहुँचे तब उन्होंने अपने माता-पिता से आश्रम की इस हालत के बारे में पूछा तब सारी बात उनकी माता ने उन्हें सविस्तार समझा दी | यह सुनकर क्रोधित परशुराम महिष्मति पहुँचे और सहस्त्रार्जुन को युद्ध के लिए ललकारा | दोनों के बीच जमकर युद्ध हुआ लेकिन परशुराम के पराक्रम के सम्मुख सहस्त्रार्जुन का बल और वरदान दोनों ही विफल हो गया | परशुराम ने उसका सिर काटा और उसकी सारी भुजाएं उखाड़कर उसे नष्ट कर दिया |

जब यह बात जमदग्नि ऋषि को ज्ञात हुई तब उन्होंने परशुराम से इस हत्या का पश्चाताप करने के लिए तीर्थयात्रा पर जाने को कहा | जब यह बात सहस्त्रार्जुन के पुत्रों को ज्ञात हुई तब अपने क्षत्रिय सहयोगियों की मदद से परशुराम की अनुपस्थिति में वे सभी महर्षि जमदग्नि के आश्रम में गए और सभी ऋषि मुनियो की हत्या कर दी और सभी आश्रमों को क्षत-विक्षत कर दिया | अंत में जमदग्नि ऋषि के ऊपर प्रहार करने लगे | 21 प्रहार करने के बाद उन्होंने जमदग्नि ऋषि का सिर धड़ से अलग कर दिया | वहीं पास जड़ अवस्था में बैठी हुईं माता रेणुका यह देखकर जोर-जोर से रोने लगी |

जब परशुराम आश्रम पहुँचे और यह अपने पिता का कटा सिर अपने माँ के निकट पड़ा हुआ देखा और उनके शव पर लगे 21 घाव देखे तब उन्होंने प्रण लिया कि वे सिर्फ हैहय वंश का ही नहीं अपितु उसके सभी सहयोगी क्षत्रिय वंशों का 21 बार नाश करेंगे | कई पुराणों में यह लिखा पाया गया है कि यह कोई मिथ्या बात नहीं थी | उन्होंने अपने इस प्रण को ना केवल पूरा किया बल्कि अपने कथनानुसार 21 बार इस धरती को क्षत्रियों से विहीन कर दिया था |

ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने उन सभी क्षत्रियों के रक्त को समन्तपंचक नामक स्थल के निकट मौजूद पांच तालाबों में भरा था तब जाकर उनकी यह खूनी प्रतिज्ञा पूर्ण हुई | उस समय ऋचीक ऋषि ने परशुराम को ऐसा कार्य करने से रोका तब जाकर इस धरती से क्षत्रियों का पलायन रुका | उसके बाद भगवान परशुराम ने अपने पिता का श्राद्ध इत्यादि कर्म किया और विश्वजीत जैसे कई यज्ञों को करने के बाद अपने पाप से छुटकारा पाया |