तो यहाँ पर रखा हुआ है परशुराम का फरसा - a2zfact | all facts

तो यहाँ पर रखा हुआ है परशुराम का फरसा


कहा जाता है कि भगवान परशुराम ने अपने परशु अर्थात फरसे से 21 बार इस समस्त धरती को क्षत्रियों से विहीन कर दिया था | इसके अलावा भी उन्होंने कई तरह के अधर्मियों का अपने इस फरसे से नाश किया था लेकिन वह फरसा आज कहाँ पर मौजूद है ? अगर आपको नहीं पता तो आज हम आपको उस फरसे से जुडी सारी महत्वपूर्ण बातें बताएँगे और साथ में यह भी बताएँगे कि वह फरसा इस समय कहाँ पर रखा हुआ है ?

झारखण्ड के गुमला से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर एक स्थान है जिसका नाम है - 'टांगीनाथ धाम' | क्योंकि झारखण्ड की स्थानीय भाषा में फरसे को टांगी बोला जाता है इसलिए इस स्थान का नाम भी टांगीनाथ धाम पड़ गया | इस स्थल पर आपको परशुराम के पावन चरणों के निशान भी मिलेंगे | यहीं पर आपको एक विशाल आकार का एक फरसा गड़ा हुआ मिलेगा |

इस स्थान में परशुराम के पहुँचने की बहुत सारी कथाएं हैं | सबसे लोकप्रिय कथाओं में से एक यह है कि त्रेतायुग में जब भगवान श्रीराम ने शिव प्रभु का धनुष तोड़ा तब परशुराम क्रोधित होकर श्रीराम और लक्ष्मण के पास आये और उन्हें दंड देने की बात सोचकर उन्हें बुरा-भला भी कहने लगे लेकिन जब उन्हें यह एहसास हुआ कि श्रीराम स्वयं श्रीहरि के अवतार हैं तब उन्हें अपने आप पर अत्यधिक लज़्ज़ा आई और पश्चाताप करने के उद्देश्य से वे भटकते हुए यहाँ आ पहुँचे और अपना फरसा यहीं गाड़कर तपस्या करने लगे | इसी कारण इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम पड़ गया |

इस धाम में गड़ा हुआ फरसा त्रिशूल के आकार जैसा भी दिखाई देता है | इसी वजह से इससे जुडी एक और प्रचलित कथा यहाँ मशहूर है | एक बार महादेव को शनिदेव की किसी बात पर अत्यंत क्रोध आ गया और उन्होंने अपना त्रिशूल शनिदेव को लक्ष्य करके फेंका लेकिन शनिदेव किसी तरह उनके इस प्रहार से बच गए लेकिन यह त्रिशूल सीधे इसी स्थान पर जाकर गिरा और गड़ गया |

लोहे से बना हुआ यह फरसा आज इतने सालों के बाद भी जंग से मुक्त रखा हुआ है एवं इसकी हवा और पानी जैसे तत्वों से कोई सुरक्षा नहीं की जाती फिर भी इसमें किसी भी तरह की जंग ना लगना बड़े ही आश्चर्य की बात है | यह फरसा ज़मीन में कितने अंदर तक धंसा हुआ है इस बात का भी कोई आधिकारिक प्रमाण मौजूद नहीं है लेकिन ऐसा अंदाजा लगाया जाता है कि यह फरसा धरती से करीब 15 फ़ीट से भी अधिक गहराई में धँसा हुआ है |

क्योंकि लोहा एक कीमती धातु है इसलिए इसे चुराने की भी बहुत कोशिश की जाती है | एक बार उस जगह के पास रहने वाले लोहारों में से किसी एक ने इस फरसे से लोहा चुराने का प्रयास किया था | उन्होंने कोशिश तो बहुत की परन्तु वे लोहे का एक छोटा सा टुकड़ा भी नहीं काट पाये लेकिन इस गलत कार्य की सजा उनकी पूरी जाति को उठानी पड़ी और किसी अज्ञात कारण के चलते उनके समुदाय में कई लोगों की मृत्यु होने लगी | अंततः उन्होंने वह स्थान ही छोड़ दिया और कही अन्यत्र जाकर बस गए और आज भी उस स्थान के आसपास लोहार समुदाय का कोई भी व्यक्ति निवास नहीं करता |

सन 1989 के आसपास पुरात्तव विभाग के लोगों में यहाँ पर खुदाई भी की थी और उन्हें यहाँ सोने-चाँदी के कई तरह के आभूषण, बर्तन एवं कई तरह के सिक्के भी मिले थे जो आज भी उस स्थान से लगे डुमरी थाने के मालखाने में मौजूद हैं | पहले यहाँ पर बहुत से पर्यटक घूमने भी आया करते थे लेकिन पता नहीं किस वजह से सरकार ने इस स्थान को उपेक्षित करना शुरू कर दिया और अब यहाँ सैलानी ना के बराबर हो गए हैं परन्तु सुनने में आया है कि शीघ्र ही सरकार अब इस टांगीनाथ धाम के उद्धार लिए एक बहुत ही बड़ी राशि घोषित करने वाली है |