यहाँ की मिटटी लगाने से ठीक हो जाता है गठिया रोग - a2zfact | all facts

यहाँ की मिटटी लगाने से ठीक हो जाता है गठिया रोग


भारत देश को हैरतअंगेज एवं आश्चर्य में डाल देने वाले चमत्कारों का देश माना जाता है | इस देश के हर कोने में आपको किसी ना किसी प्रकार का चमत्कार और हैरान कर देने वाले स्थान मिलेंगे | इस देश में रहने वाले विभिन्न धर्मों के लोगों की अपनी-अपनी मान्यताएं हैं और कुछ मान्यताओं को सुनने के बाद तो आप भी आश्चर्यचकित रह जायेंगे | आज हम आपको एक ऐसी जगह के बारे में बताएँगे जहाँ पर किसी भी प्रकार का कोई भी धार्मिक स्थल मौजूद नहीं है | इसके बावजूद वहाँ सैकड़ों की संख्या में लोग प्रतिदिन पहुँचते हैं लेकिन आखिर क्यों ?

इसका कारण भी सुनकर आप अवश्य चौंक जायेंगे | उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के पास स्थित इस 'झलोखर गांव' की कहानी कुछ है ही ऐसी अनूठी | इस गांव में किसी भी प्रकार का कोई धार्मिक स्थल नही है और ना ही इस गांव में किसी भी प्रकार की कोई मूर्ति पूजा होती है लेकिन फिर भी इस गांव के लोगों के मन में अपने गृहक्षेत्र के लिए अपार श्रद्धा और आस्था की भावना जुड़ी है |

इस गांव में एक बहुत ही विशाल नीम का पेड़ है जिसके नीचे बना एक दैवीय टीला यहाँ के ग्रामीणों के लिए धर्म और आस्था का एक विशेष केंद्र बना हुआ है | गांववालों का कहना है कि इस टीले में एक अद्भुत अलौकिक शक्ति छुपी हुई है | उनका यह भी कहना है कि यदि इस टीले के नीचे रखी मिट्टी को गठिया रोग (आर्थराइटिस) वाले व्यक्ति प्रतिदिन इस्तेमाल करें तो उन्हें अपने इस रोग से जल्द ही मुक्ति मिल सकती है |

ऐसा कहा जाता है कि यदि लगातार पांच रविवार तक इस मिट्टी को गठिया रोग से ग्रसित व्यक्ति इस्तेमाल करे तो उसे इन पांच हफ्तों के अंदर ही इस रोग से निजात मिल जाती है | इस नीम के पेड़ के पास स्थित टीले की पूजा हेतु जिस पुजारी का चयन किया जाता है वह कुम्हारों की जाति का होता है | वर्तमान में पुजारी के पद पर पदस्थ कालीदीन प्रजापति कहते हैं कि इस मिट्टी को लगाने से गठिया रोग का शीघ्र ही इलाज़ हो जाता है | इसी वजह से इस गाँव के आसपास के ही नहीं बल्कि देश के कई बड़े शहरों के लोग भी अपने इस असाध्य रोग का इलाज़ करवाने यहाँ पहुँचते हैं |

इसी वजह से यहाँ हर रविवार को बहुत बड़ी भीड़ इलाज़ के लिए उमड़ती है | अंग्रेजो के शासन के समय सन 1875 के आसपास 'कर्नल टॉड' यहाँ आये थे और उन्होंने लिखा था कि इस जगह के निकट स्थित तालाब में पारा एवं गंधक की अत्यधिक मात्रा उपस्थित होने के कारण यहाँ के लोगों को गठिया रोग की कोई समस्या नहीं होती और इस जगह की मिट्टी के इस्तेमाल से किसी भी प्रकार का गठिया रोग कुछ ही समय में आसानी से ठीक हो जाता है |

हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि बहुत साल पहले कुम्हारों के समुदाय के एक व्यक्ति प्रेमदास प्रजापति को एक स्वप्न आया था | उस स्वप्न में उसे देवी माँ ने दर्शन देकर कहा था कि उनका निवास स्थल मिट्टी से बना होगा जिसकी मिट्टी की सहायता से लोग अपने गठिया रोग का आसानी से इलाज़ कर सकेंगे |

इस जगह के पास स्थित एक कॉलेज के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष के अनुसार हिंदू ग्रन्थ 'माँ भुवनेश्वरी महात्म्य' में इस स्थान का उल्लेख मिलता है | उनका कहना है कि जिस तालाब के निकट यह मिट्टी पायी जाती है | उस तालाब को उत्तर वैदिककाल में सूरजकुंड के नाम से जाना जाता था | इसलिए यह जगह पवित्र मानी जाती है और यहाँ की मिट्टी गठिया जैसे असाध्य रोग का इलाज़ करने में सक्षम है |

वहीं दूसरी तरफ इस स्थान की मिट्टी के ऊपर शोध कर चुके बाँदा के राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के प्राचार्य डॉ.एस.एन. सिंह का के अनुसार यह कोई दैवीय शक्ति नहीं अपितु नीम के औषधीय गुणों का कमाल है | उनका कहना है कि नीम में कई प्रकार के रोगों को ठीक करने का औषधीय गुण होता है जिस कारण से इस गांव की मिट्टी से गठिया जैसे रोग का इलाज़ भी आसानी से हो जाता है | बहरहाल, किसी का कुछ भी कहना हो लेकिन इस जगह की मिट्टी किसी चमत्कार से कम नहीं है |