जब सहस्त्रार्जुन ने बनाया रावण को बंदी - a2zfact | all facts

जब सहस्त्रार्जुन ने बनाया रावण को बंदी


हम सभी यह जानते हैं कि श्रीराम ने रावण के अहंकार और घमंड को तोड़ते हुए उसे मारकर लंका पर विजय प्राप्त की थी | इसके पहले रावण ने लगभग सभी राजाओं यहाँ तक कि कई देवताओं को भी परास्त करके उनकी सम्पति आदि पर कब्ज़ा भी किया था | उदाहरण के लिए उसकी सोने की लंका उसकी स्वयं की सम्पति ना होकर रिश्ते में उसके भाई लगने वाले धन के देवता कुबेर की सम्पति थी लेकिन रावण ने उसे हराकर उसकी लंका और उसका पुष्पक विमान भी छीन लिया था |

उसके विजय रथ को रोकने में कुछ ही लोग समर्थ हो पाये थे | उनमे से एक था वानरराज बलि जिसने छः महीने तक रावण को अपनी बगल में दबा कर रखा था लेकिन वह एक वानर था | मनुष्यों में श्रीराम के पहले केवल एक ही व्यक्ति ऐसा था जिसने रावण के विजयरथ को रोकने की हिम्मत दिखाई थी और वह था हैहय वंश का राजा सहस्त्रार्जुन जिसे उसके पिता के नाम अर्थात कार्तेयवीर कहकर भी बुलाया जाता था | (जानिए कैसे मृत्यु हुई सहस्त्रबाहु और उसके समस्त क्षत्रियवंश की)

एक समय जब रावण विश्वविजय पर निकला था तब वह समस्त भारत के राजाओं को हराता हुआ महिष्मति नामक राज्य पहुँचा जहाँ पर राजा सहस्त्रार्जुन का शासन चलता था | जब रावण अपनी सेना के साथ महिष्मति के निकटतम नदी के पास पहुँचा तब उसने सोचा क्यों ना अपने आराध्य प्रभु शिव की आरधना की जाये और उसने उस नदी के तट पर ही एक शिवलिंग की स्थापना की और भगवान शिव की पूजा करने लगा |

उसी समय उस नदी के दूसरे छोर पर राजा सहस्त्रार्जुन अपने अनेक रानियों के साथ घूमने निकले थे | राजा सहस्त्रार्जुन को भगवान दत्तात्रेय ने हज़ार भुजाओं का आशीर्वाद दिया था जिसे उनकी सभी पत्नियाँ जानती थी | इस कारणवश सभी रानियों ने उनसे उन भुजाओं की सहायता से कुछ अनूठा करने का अनुरोध किया | तब सहस्त्रार्जुन ने अपनी हज़ार भुजाओं की सहायता से उस नदी के असीमित बहाव को रोक दिया परन्तु इससे नदी के दूसरे छोर पर जल की मात्रा अत्यधिक बढ़ गयी और जिसके कारण रावण का शिवलिंग भी नदी में बह गया |

यह देख रावण क्रोधित हो गया और अपने कुछ सैनिकों को इस बात का पता लगाने के लिए नदी के दूसरे छोर पर जाने का आदेश दिया | जब रावण के सैनिक नदी के उस छोर पर पहुँचे तब उन्हें सम्पूर्ण स्थिति ज्ञात हो गयी और उन्होंने राजा सहस्त्रबाहु को दंड देने के लिए उन्हें बंदी बनाने की कोशिश की लेकिन राजा सहस्त्रबाहु ने अपने पराक्रम से उन सैनिकों को आसानी से परास्त कर दिया |

हारे हुए सैनिकों ने रावण को पूरी स्थति से अवगत कराया तब रावण स्वयं युद्ध करने के लिए निकल पड़ा | जब वह सहस्त्रबाहु के पास पहुँचा तब उसने सहस्त्रबाहु को युद्ध के लिए ललकारा लेकिन सहस्त्रबाहु ने यह कहकर लड़ने से मना कर दिया कि रावण अभी उसका मेहमान है इसलिए वह रावण से युद्ध नहीं कर सकता परन्तु अपने विश्वविजय के मद में चूर रावण ने महापराक्रमी सहस्त्रबाहु को अपशब्द कहते हुए उसे युद्ध करने के लिए कहा और अंत में ना चाहते हुए भी सहस्त्रबाहु को रावण से युद्ध करना पड़ा |

युद्ध कई दिनों तक चलता रहा और दोनों ही योद्धाओं ने हर तरह की शक्ति का प्रयोग किया | अंत में सहस्त्रार्जुन ने अपना असली रूप दिखाते हुए अपने हज़ार हाथो से रावण को कसकर जकड़ लिया | रावण ने बहुत कोशिश की परन्तु वह उसकी पकड़ से छूट ना पाया और सहस्त्रबाहु ने उसे अपने कारागार में डाल दिया | जब यह बात रावण के दादा महर्षि पुलस्त्य को ज्ञात हुई तब वे स्वयं सहस्त्रार्जुन के पास पहुँचे और उससे माफ़ी माँगकर रावण को आज़ाद करवाया | इसके बाद रावण ने सहस्त्रार्जुन से दोस्ती कर ली और लंका चला गया |