इस कथा के बारे में
जानने से पहले हमें यह जानना होगा कि ऐतरेय ब्राम्हण ग्रन्थ क्या है ? हमारी भारतीय
संस्कृति में कुल चार वेद हैं -
1. ऋग्वेद 2. यजुर्वेद 3. सामवेद 4. अथर्ववेद
प्रत्येक वेद को दो
भागों में विभाजित किया गया है वे दो भाग ब्राम्हण एवं मन्त्र के नाम से जाने जाते
हैं | मंत्रो के इस भाग को संहिता पुकारा जाता है और ब्राम्हण को कुल तीन भागों में
बांटा गया है -
1. उपनिषद 2. ब्राम्हण 3. आरण्यक
इस ब्राम्हण ग्रन्थ
के भाग में हमारे नित्य-प्रतिदिन होने वाली क्रियाओं के बारे में बताया जाता है | इन्हीं
ब्राम्हण ग्रंथो में से एक है 'ऐतरेय ब्राम्हण ग्रन्थ' | इस ग्रन्थ में कुल मिलाकर
चालीस अध्याय हैं जो आपके जिंदगी में होने वाली हर तरह की क्रियाओं से सम्बन्ध रखते
हैं | इस ऐतरेय ब्राम्हण की रचना कैसे हुई और इसकी रचना किसने की ? इसी बात की व्याख्या
हम आपसे आज के अंश में करेंगे |
माण्डुकी और इतरा नाम
के एक ब्राम्हण दम्पति थे | भगवान का नाम हर समय जपने के कारण उनके जीवन में कोई कष्ट
नहीं था | उनके जीवन में पवित्रता निवास करती थी | उनके दुःख का कारण तो बस यह था कि
उनकी कोई भी संतान नहीं थी | संतान प्राप्ति के लिए वे हर तरह का यज्ञ करते और हर समय
भगवान से यही मनाते कि उनकी ज़िन्दगी एक संतान की किलकारी से गूँज उठे |
अंततः भगवान ने भी
उनकी सुन ली और एक पुत्ररूपी रत्न उनके घर भेजा | वह बालक जन्म से ही विचित्र, अलौकिक
और आश्चर्यजनक गुणों का मालिक था | जब वह पैदा हुआ वह आम बच्चों की तरह चिल्लाया नहीं
बल्कि शांत ही बैठा रहा | बहुत समय गुजरने के पश्चात उसके मुँह से निकलने वाला पहला
शब्द था - 'वासुदेव' | यह सुनकर दोनों ब्राम्हण दम्पति अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें
लगा कि उनका बालक भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त और चमत्कारिक गुणों से भरपूर है इसलिए
उन्होंने उसका नाम रखा - 'ऐतरेय' |
कुछ समय बीत जाने के
बाद भी उस बालक ने वासुदेव नाम का जाप करना नहीं छोड़ा | जब वह आठ साल का हुआ तब उसके
पिता ने उसका 'यज्ञोपवीत संस्कार' करवाया और उसे वेद का पाठ करवाने की कोशिश की लेकिन
तब भी उसके मुँह से केवल वासुदेव शब्द का जाप होता रहा | बहुत समझाने के बाद भी जब
वह नहीं माना तब उसके पिता ने उसे मूर्ख समझकर उसे उसकी माता के साथ छोड़ दिया |
उसके पिता ने दूसरा
विवाह कर लिया और उस विवाह से उन्हें अनेक पुत्रों की प्राप्त हुई | कुछ समय बाद उनके
सभी पुत्र जब बड़े हुए तब उन्होंने सबको वेद पाठ कराया | उनके सभी पुत्र मेधावी निकले
और उनकी ख्याति दूर-दूर तक पहुँचने लगी | इधर ऐतरेय की माँ का जीवन पूरी तरह से नष्ट
हो रहा था और उन्हें घर में कोई सम्मान भी प्राप्त नहीं हो रहा था |
एक दिन ऐतरेय की माँ
विष्णु मंदिर में जा पहुँचीं जहाँ पर ऐतरेय भगवान श्रीहरि का नाम जप रहा था | यह देखकर
उसकी माँ क्रोधित होकर बोलीं कि तुम्हारे जैसा पुत्र पाकर भी मेरी ज़िन्दगी में किसी
भी प्रकार का कोई फायदा नहीं हुआ और कोई भी सम्मान तक नहीं करता | तुम्हीं बताओ मैं
ऐसी घृणा वाली जिंदगी जीकर क्या करुँ ?
यह सुनकर दुखी ऐतरेय
ने कहा कि माँ जिस दुनिया का तुम्हे मोह है | उस दुनिया में श्रीहरि का नाम छोड़कर सब
कुछ नश्वर है लेकिन मुझे यह एहसास हो गया है कि मुझे आपके लिए सम्मान प्राप्त करना
है | मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं आपको ऐसा सम्मान प्राप्त कराऊंगा जहाँ लोग कई साल
तपस्या करने के बाद भी नहीं पहुँच पाते |
उसी समय उसने भगवान
विष्णु की सच्चे मन से समस्त वेदों के नियमानुसार आराधना की | उसकी स्तुति सुनकर भगवान
विष्णु अत्यंत प्रसन्न हो गए और उसे दर्शन देते हुए कहा कि तुम्हे वेदों का ज्ञान नहीं
है परन्तु मेरे आशीर्वाद से आज से तुम सभी वेदों के ज्ञानी बन जाओगे | आगे चलकर तुम
वेद के एक ऐसे अज्ञात तत्व की खोज करोगे जिसे तुम्हारे ही नाम अर्थात 'ऐतरेय ब्राम्हण'
के नाम से जाना जायेगा | आज से तुम सभी प्रकार के कर्म अर्थात विवाह करना एवं गृहस्थी
बसाना इत्यादि यह सोचकर करो कि यह मेरा आदेश है परन्तु कभी भी इस संसार की नाशवान माया
के चक्कर में मत फँसना | तुम सीधे यहाँ से कोटितीर्थ जाओ वहाँ पर हरिमेधा जी यज्ञ का
आयोजन कर रहे हैं | उन्हें एक ज्ञानी ब्राम्हण की जरुरत है | वहाँ जाने पर तुम्हारी
माँ की सभी मनोकामनएं पूर्ण हो जाएँगी और इतना कहकर भगवान विष्णु वहाँ से अदृश्य हो
गए |
भगवान विष्णु जी के
जाने के बाद ऐतरेय की माता उसे श्रद्धा की नज़रों से देखने लगी क्योंकि जिस वजह से उसकी
माँ उसे कोस रहीं थीं | आज उसी वजह से उसे सबसे दुलर्भ दर्शन अर्थात साक्षात भगवान
श्रीहरि के दर्शन हुए थे | इसके बाद ऐतरेय अपनी माँ के साथ सीधे हरिमेधा के यहाँ कोटितीर्थ
पहुँचे | वहाँ उनके तेज़ से सब अत्यंत प्रभावित हो गए | स्वयं हरिमेधा ने उन्हें उच्च
आसन पर बैठाकर उनसे उनके बारे में पूछा | उसके बाद ऐतरेय ने भगवान विष्णु की कृपा से
उस अज्ञात वेद के चालीस अध्यायों का पाठ किया जिससे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी
| उनकी इस विधा से प्रभावित होकर हरिमेधा ने अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर दिया | ऐतरेय
जी की इस ख्याति से उनकी माता की मनोकामना भी पूरी हो गयी |
