वैसे तो भारतीय इतिहास
बहुत बड़ा और असंख्य किस्सों से भरा पड़ा है लेकिन इसकी कुछ कहानियाँ बहुत ही रोचक हैं
| उन्हीं में से एक विचित्र किस्सा आज आपको प्रस्तुत किया जा रहा है | भारतीय समाज
में भगवान विष्णु को सबसे उच्च देवताओं में से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है लेकिन क्या
आपको पता है कि एक समय ऐसा भी आया था जब भगवान विष्णु को अश्व अर्थात घोड़ा और उनकी
धर्मपत्नी लक्ष्मी जी को अश्वी अर्थात घोड़ी बनना पड़ा था ? इसी कहानी के सच से हम आपको
आज अवगत कराएँगे |
बहुत समय पहले की बात
है एक बार भगवान विष्णु बैकुंठ धाम के क्षीरसागर में अपने शेषनाग के आसन पर आराम कर
रहे थे और माता लक्ष्मी उनकी सेवा में तल्लीन थीं | उसी समय वहाँ से रेवंत अपने सबसे
सुन्दर उच्चेःश्रवा नामक सफ़ेद रंग के घोड़े पर सवार होकर बैकुंठ धाम से गुजर रहा था
| ऐसा कहा जाता है कि उच्चेःश्रवा दुनिया का सबसे सुन्दरतम घोड़ा था और उसकी सुंदरता
का कोई मुकाबला नहीं था |
लक्ष्मी जी उसकी इस
सुंदरता से प्रभावित हो गयीं और उनका ध्यान श्रीहरि से हटकर उस घोड़े की तरफ हो गया
| यह देखकर विष्णु जी ने उनका ध्यान अपनी ओर करने की कोशिश की और उन्हें पुकारा लेकिन
वे उस घोड़े की सुंदरता से इस कदर सम्मोहित हो गयीं थीं कि उन्हें विष्णु जी की आवाज
ही नहीं सुनाई दी | इस कारण विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने लक्ष्मी जी को श्राप
दे दिया कि जिस अश्व की सुंदरता से तुम इतनी प्रभावित हो रही हो आज से अब तुम भी उन्हीं
के सामान अर्थात अश्वी हो जाओगी |
जब उच्चेःश्रवा अश्व
वहाँ से चला गया तब लक्ष्मी जी को यह ज्ञात हुआ कि उन्हें विष्णु जी ने नाराज होकर
श्राप दे दिया है | यह सुनकर वे तुरंत विष्णु जी से क्षमायाचना मांगने लगीं और उनसे
प्रार्थना की कि वे श्राप को वापस ले लें क्योंकि वे उनके बिना जीवित नहीं रह पाएंगी
परन्तु विष्णु जी का यह कहना था कि एक बार दिया गया श्राप वापस नहीं लिया जा सकता
| अतः उन्होंने लक्ष्मी जी को एक वरदान देते हुए कहा कि जब तुम अश्वरूप में प्रसव प्रक्रिया
से गुजरकर एक संतान को जन्म दोगी तब ही तुम्हे अपने इस अश्वरूप से मुक्ति मिलेगी |
यह सुनकर अश्वरूप धारण
की हुई लक्ष्मी जी सीधे तमसा एवं गंगा नदी के समागम पर जाकर भगवान शिव की तपस्या करने
लगीं | उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें दर्शन दिया और वरदान मांगने को
कहा तब लक्ष्मी जी ने उन्हें सारा किस्सा सुनाया और प्रार्थना की वे उनकी मदद करें
|
सारा वृतांत सुनने
के पश्चात शिव जी ने उनसे कहा कि आप चिंता ना करें | मैं विष्णु जी से जाकर कहूँगा
कि वे अश्वरूप धारण करके यहाँ आपके साथ रहें जिससे शीघ्र ही आपको एक संतान की प्राप्त
हो और आप पुनः अपने स्वाभाविक रूप में आकर बैकुंठ धाम में विष्णु जी के साथ आनंदपूर्वक
रहें |
यह सुनकर लक्ष्मी जी
प्रसन्न मन से वापस अपनी साधना में लीन हो गयीं और उस समय का इंतज़ार करती रहीं जब तक
कि विष्णु जी अश्वरूप धारण करके उनके पास नहीं आ जाते लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद
भी जब विष्णु जी अश्वरूप में उनके पास नहीं पहुँचे तब उन्होंने एक बार फिर से भगवान
शिव का स्मरण किया | भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि अभी आपको थोड़ा और इंतज़ार
करना होगा जल्द ही विष्णु जी अश्वरूप में आपसे मिलेंगे और इतना कहकर वे अदृश्य हो गए
|
जब शिव जी अपने कैलाश
धाम पहुँचे तब उनके मन में एक ही विचार आया कि कैसे विष्णु जी को अश्वरूप धारण कर लक्ष्मी
जी के पास भेजने के लिए कहा जाये | यह सोचकर उन्होंने अपने एक गण चित्ररूप को विष्णु
जी के पास सन्देश देकर भेजा | वह दूत जब सन्देश लेकर विष्णु जी के पास पहुँचा तब विष्णु
जी ने उससे सारी बात विस्तारपूर्वक बताने को कही |
उस दूत ने सारी बात
विष्णु जी को बता दी | सब सुनकर विष्णु जी अश्व बनने के लिए तैयार हो गए और अश्वरूप
धारण करके सीधे गंगा और तमसा नदी के समागम पर पहुंचकर वहाँ विचरने लगे | विष्णु जी
को अश्वरूप में अपने पास विचरता देखकर लक्ष्मी जी बहुत प्रसन्न हुईं और उनके साथ घूमे
लगीं |
कुछ ही समय बाद वह
समय भी आया जब वे गर्भवती हो गयीं और उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया और उन्हें अपने
श्राप से मुक्ति भी मिल गयी | बैकुंठ धाम जाने से पहले उन्होंने अपने इस पुत्र जिसका
नाम उन्होंने 'हैहय' रखा था को निःसंतान राजा तुर्वसु को सौंप दिया क्योंकि ययातिपुत्र
तुर्वसु की कोई संतान नहीं थी और वे संतान प्राप्ति के लिए पुत्रप्राप्ति यज्ञ भी कर
रहे थे | कालांतर में इसी हैहय के नाम पर हैहय वंश नामक प्रतापी साम्राज्य की स्थापना
हुई |
