महाभारत का युद्ध एक
ऐसे मोड़ पर आ पहुँचा था जहाँ गुरु द्रोणाचार्य चक्रव्यूह की रचना कर रहे थे और यह नज़ारा
देखकर पांडव चिंतित हो रहे थे क्योंकि चक्रव्यूह को तोड़ने की कला पांडवों में सिर्फ
अर्जुन को ही पता थी लेकिन कौरवों ने सम्मिलित प्रयास से अर्जुन को युद्ध में खींचकर
मुख्य रणभूमि से दूर ले गए | अब पांडवों को चिंता सता रही थी कि गुरु द्रोण के चक्रव्यूह
से कैसे बचा जाये ? ऐसे समय में अर्जुनपुत्र अभिमन्यु ने यह व्यूह तोड़ने की ज़िम्मेदारी
ली |
शुरुआत के छह व्यूह
उसने आसानी से तोड़ दिए | सातवें व्यूह में प्रवेश करने के बाद उसे दुर्योधन, दुःशासन,
जयद्रथ समेत सात सेनानियों ने घेर लिया लेकिन यह देखकर अर्जुनपुत्र विचलित नहीं हुआ
| उसने सारे हथियार टूटने और अपने सारथि के मरने के बाद भी बड़ी वीरतापूर्वक युद्ध किया
और आखिरी में अपने रथ के पहिये की सहायता से दुर्योधन के पुत्र को मार गिराया |
यह देखकर जयद्रथ क्रोधित
हो गया और उसने पीछे से हथियाररहित अभिमन्यु की हत्या कर दी | जब यह बात अर्जुन को
बात पता चली तो उसने प्रतिज्ञा की "कल शाम तक अगर मैंने जयद्रथ का वध नहीं किया
तो मै अग्नि में बैठकर आत्मदाह कर लूंगा |" यह बात जब दुर्योधन को पता चली तो
उसने युद्ध के अगले पूरे दिन जयद्रथ को छुपाकर रखा | धीरे-धीरे शाम होने लगी पर अर्जुन
को जयद्रथ कहीं दिखाई ना दिया |
अंत में शाम हो गयी
और उधर जयद्रथ भी ख़ुशी के कारण बाहर आ गया एवं इस बात का जश्न मनाने लगा कि अब तो अर्जुन
को अग्नि समाधि लेनी ही पड़ेगी | जब अर्जुन अग्नि में समाधि लेने ही वाला था कि तभी
अचानक अर्जुन को सूर्य दिखाई दिया तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि अभी शाम नहीं
हुई है | यह तो जयद्रथ को भ्रमित करने के लिए उन्होंने एक माया रची थी |
यह सुनकर अर्जुन ने
अपना गांडीव धनुष उठाया और जयद्रथ को मारने के लिए निकल पड़ा | तभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन
को सलाह दी " जयद्रथ को यह वरदान प्राप्त है कि जो व्यक्ति जयद्रथ का सिर ज़मीन
पर गिराएगा उसका सिर भी उसी क्षण 100 टुकडो में टूट जायेगा | यहाँ से 100 योजन दूर
जयद्रथ का पिता तपस्या कर रहा है इसलिए तुम इसका सिर ऐसे काटो कि इसका सिर इसके पिता
कि गोद में जाकर गिरे |"
यह सुनकर अर्जुन ने
सावधानी से मन्त्र अभिमंत्रित कर एक तीर छोड़ा जो जयद्रथ का सिर काटता हुआ सीधे 100
योजन दूर उसके पिता की गोद में जाकर गिरा | जयद्रथ के पिता की जब आँख खुली और उन्होंने
यह नज़ारा देखा तो तुरंत खड़े हो गए और इस वजह से जयद्रथ का सिर ज़मीन पर गिर गया एवं
जयद्रथ को प्राप्त वरदान स्वरुप उसके पिता का सिर 100 टुकड़ों में विभक्त हो गया |
